“थाने में ‘राजा’ का राज: या खुला खेल फर्रुखाबादी—जब कानून के रखवालों ने ही दिखाया अधिवक्ता को बाहर का रास्ता!”

स्वतंत्र पत्रकार चंदन दुबे

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“थाने में ‘राजा’ का राज: या खुला खेल फर्रुखाबादी—जब कानून के रखवालों ने ही दिखाया अधिवक्ता को बाहर का रास्ता!

 

 

 

 

मीरजापुर:** “क्लाइंट क्लाइंट मत करिये, यहाँ के राजा हम हैं!”— यह कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं, बल्कि मीरजापुर के कोतवाली कटरा थाने में अधिवक्ता प्रशांत कुमार त्रिपाठी के साथ हुई घटना पर उन्हों ने यह जानकारी देते हुए आरोप लगाया है। 1 अक्टूबर 2024 की रात 9 बजे, जब प्रशांत अपने कानूनी काम के सिलसिले में थाना पहुँचे, तो उन्हें कानून के संरक्षण का अनुभव तो दूर, बेइज्जती और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा।

मौजूदा मुंशी और सिपाही रजनीश और अरविंद, जो थाने में तैनात थे, ने न सिर्फ अधिवक्ता के साथ अभद्रता की, बल्कि उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाते हुए कहा, “जो करना है न्यायालय में करो, यहाँ के राजा हम हैं।” यह प्रशांत ने अपने लिखित शिकायत पत्र में बयां किया है।

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 क्या संवैधानिक नियमों का मजाक बन रहा है?

ऐसा लगता है कि थाना कोतवाली कटरा में कुछ लोग अपने संवैधानिक कर्तव्यों और पुलिस सेवा के आदर्शों को भूल चुके हैं। संविधान हमें यह सिखाता है कि पुलिस का काम जनता की सेवा करना है, न कि अपनी मर्जी से कानून चलाना।

अगर यह घटना हुआ है तो हमें यह सवाल उठाने पर मजबूर करती है: क्या कानून के रखवाले खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं? जब खुद एक अधिवक्ता के साथ ऐसा व्यवहार होता है, तो आम जनता का क्या हाल होता होगा?

*कहावतों का सच: “बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधेगा?”*

यह तो वही हाल हो गया है जैसे “चौकीदार ही चोर निकल गया।” पुलिस को न्याय का प्रतीक माना जाता है, लेकिन जब वह खुद अन्याय करने पर उतारू हो जाए, तो न्याय की उम्मीद कहाँ से की जाए?

अधिवक्ता त्रिपाठी ने मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों से की है और दोनों सिपाहियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या अधिकारियों की नींद खुलेगी? या यह मामला भी “जाँच जारी है” की दलीलों में दब कर रह जाएगा? क्या उस घटना की सीसीटीवी चेक होगी। इस आप के जांच का खुलासा होगा यह सवाल पारदर्शिता के स्तंभ को दर्शाता है।

 *अधिकार या मनमानी?*

इस घटना से एक गंभीर सवाल खड़ा होता है कि क्या पुलिस प्रशासन अपने कर्तव्यों को भूलकर मनमानी पर उतर आया है? क्या नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के नाम पर अभद्रता का यह खेल खुलेआम चलता रहेगा?

सरकारी नीतियों और संवैधानिक नियमों के तहत जनता को न्याय का अधिकार दिया गया है। लेकिन जब वही लोग, जिनके ऊपर न्याय और सुरक्षा की जिम्मेदारी है, खुद कानून की धज्जियाँ उड़ाते नजर आएँ, तो यह न केवल लापरवाही का प्रमाण है, बल्कि हमारी न्यायिक व्यवस्था के प्रति भी एक गंभीर प्रश्नचिन्ह है। जिसे खुला खेल फर्रुखाबादी के नाम से कहा जाना जा सकता है।

**अब देखना यह है कि कब तक “जाँच” होती है और आखिरकार दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है। या फिर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा, जैसे अक्सर होता है।**

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