Mirzapur News :- जानलेवा हमले में पुलिस ने दर्ज की कमजोर धाराए , पीड़ित 15 दिन भर्ती था अस्पताल में , हमलावर पर नहीं लगा 109 की धारा , क्या यही है न्याय संगत ?
मिर्जापुर में कानून का मजाक: किसान पर जानलेवा हमला, फिर भी नहीं दर्ज किया 109 की धारा
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में एक बार फिर कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाई गईं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कानून-व्यवस्था दुरुस्त होने के दावे का झूठ सामने आया है। मिर्जापुर के कछवा थाना क्षेत्र में एक दर्दनाक और चौंकाने वाली घटना ने यूपी की कानून-व्यवस्था की पोल खोल दी है। जहां स्थानीय दबंगों ने एक किसान पर जानलेवा हमला किया और पुलिस ने इस गंभीर घटना पर केवल कमजोर धारा ही लगाए । मुख्यमंत्री के कानून-व्यवस्था सुधारने के दावों के बावजूद, मिर्जापुर का कछवा थाना क्षेत्र आज एक नया उदाहरण बन चुका है कि कैसे पुलिस और अपराधियों के साठ गांठ का सम्बन्ध चोली-दामन नाजिर के मिसाल पेश करता है और यही कारण है कि कानून को मजाक बनता है।
आइये मामले को जानते है :-
कछवा के पीड़ित किसान अभिषेक कुमार द्विवेदी ने पहले ही पुलिस को अपने खेत में जबरन कब्जा करने और फसल काटने की सूचना दी थी, लेकिन पुलिस ने इसे गंभीरता से लेने के बजाय आंखें मूंद लीं। जब दबंगों ने खेत में घुसकर किसान पर हमला किया, तो पुलिस नदारद रही। सिर पर धारदार हथियार से जानलेवा चोटों के बाद भी पुलिस ने मेडिकल रिपोर्ट की गंभीरता को नजरअंदाज करते हुए, हल्की धाराएं लगाईं जो आरोपियों के लिए एक वरदान साबित हुईं।
बता दे की मामला:—26 जुलाई को अभिषेक कुमार पर खेत में हमला हुआ, लेकिन ये हमला अचानक नहीं था। अभिषेक ने पहले ही पुलिस को सूचना दे दी थी कि उनके खेत में फसल काटने की साजिश रची जा रही है। पुलिस को जैसे सांप सूंघ गया, उसने न तो समय पर कदम उठाया और न ही किसी प्रकार की सुरक्षा प्रदान की। जब लाठियां और धार धार हथियार चल रही थीं, तब पुलिस थाने में अपनी आंखें मूंदे बैठी रही, जैसे इस घटना में मानो पुलिस की व्यू यह रहा की, “देखो, पर कुछ मत करो।” पर यहाँ सवाल यह उठता है की—क्या पुलिस की यही भूमिका है? क्या पुलिस का काम सिर्फ तमाशबीन बनकर देखना है, जब लोगों पर जानलेवा हमले हो रहे हों?
पीड़ित का आरोप है कि पुलिस ने घटना की गंभीरता को हल्का कर दिया । मेडिकल रिपोर्ट ने साफ तौर पर पीड़ित की हालत को ‘डेंजर पोजीशन’ बताया, लेकिन पुलिस ने इसे नजरअंदाज कर दिया और पीड़ित के इलाज के बावजूद धाराएं कमजोर रखी गईं। मिर्जापुर, जो तीन जिलों का मंडलीय केंद्र है, वहां के बड़े अधिकारियों की भी इस पूरे मामले में भूमिका संदिग्ध है। यह साफ दिखाता है कि पुलिस प्रशासन अपराधियों के साथ मिलकर न्याय को दरकिनार कर रहे हैं। पीड़ित अभिषेक ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि पुलिस ने जानबूझकर केस की धाराएं हल्की कर दीं, ताकि आरोपी बच निकले। मेडिकल रिपोर्ट, गवाहों के बयान और जमीन पर पड़ी खून की निशानियां भी पुलिस के लिए कोई मायने नहीं रखतीं। पुलिस का रवैया ऐसा था, जैसे वह आरोपी पक्ष से मिली हो। “जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया,”—यही कहावत पुलिस के काम पर सटीक बैठती है। मेडिकल के आधार पर कहा जाए तो न्याय दिलाने का दावा करने वाली पुलिस खुद इस मामले में ‘दलाली’ करती दिख रही है।
मुख्यमंत्री के दावे हवा में: “कानून का राज” या “अन्याय का नाच”?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बार-बार बड़े-बड़े मंचों से यह कहते हैं कि यूपी में कानून-व्यवस्था सबसे बेहतर है।पुलिस को कड़े निर्देश दिए हैं कि कानून का पालन हो और अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। लेकिन मिर्जापुर की यह घटना उनकी सरकार के इन दावों का मजाक बना रही है। “ऊपर से शेर, अंदर से ढेर”— ऐसा ही कुछ हाल यहां की पुलिस का दिख रहा है। एक तरफ किसानों पर हमले हो रहे हैं, दूसरी तरफ पुलिस एफआईआर में सिर्फ मामूली धाराएं जोड़कर अपना पल्ला झाड़ रही है।
यहां सवाल यह है कि क्या योगी सरकार के कानून का राज सिर्फ भाषणों में है? जब किसानों की फसलें लूटी जा रही हैं और उनकी जान पर बन रही है, तब कानून की किताबें थानों में धूल खा रही हैं। और कानून का संचालन करने वाला दलाली जहां इस मामले में स्थिति यही दिख रही है आरोप के आधार पर।
मामला सिर्फ एक खेत का नहीं, बल्कि पुलिस और जमीन कब्जा माफिया की मिलीभगत का भी है। किसानों से जमीन छीनने का खेल लंबे समय से जारी है, और पुलिस इसमें मुख्य किरदार निभा रही है। अभिषेक के आरोप बताते हैं कि कैसे पुलिस ने जानबूझकर उनकी शिकायतों को नजरअंदाज किया और हमलावरों को खुली छूट दी।
“मुंह में राम, बगल में छुरी”— पुलिस का यह रवैया दिखाता है कि उसे न्याय की कोई परवाह नहीं, बल्कि वह सिर्फ अपने ‘स्वार्थ’ की रोटी सेंकने में लगी है।
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कानून का मजाक: धारा 118(1), 352, 351(3) की असलियत
पुलिस ने अभिषेक पर हुए हमले के बाद जो धाराएं लगाई हैं, वे न सिर्फ हास्यास्पद हैं, बल्कि यह दर्शाती हैं कि कैसे कानून की व्यवस्था को एक ‘खेल’ में बदल दिया गया है। गंभीर चोटें लगने के बावजूद, इस मामले में लगाई गई धाराएं कमज़ोर साबित हुई हैं। यह तो वही कहावत हो गई—“बंदूक की नली में नंगी धार”—जहां अपराधी के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर सिर्फ कागज़ी प्रक्रिया निभाई गई। जहां वास्तविकता में भारतीय न्याय संविधान के नए कानून की धारा 109 110 की बढ़ोतरी होनी थी वहां पीड़ित के वकील का आरोप है कि, डेंजर मेडिकल रिपोर्ट के बाद भी नए कानून के मामूली धारा को लगाकर विपक्षियों को लाभ दिया जा रहा है और विपक्षियों की गिरफ्तारी नहीं की गई क्योंकि पीड़ित का आरोप है कि पुलिस और अपराधियों का चोली-दमन का साथ यह मामला मिलीभगत को भी उजागर करता है। जब अभिषेक ने अपने खेत की रक्षा के लिए आवाज उठाई, तब पुलिस ने अपनी आँखें बंद कर लीं। अब तो यह स्पष्ट हो गया है कि अपराधियों को खुली छूट देने वाली यह पुलिस खुद एक दलाली की तरह व्यवहार कर रही है।
न्याय की उम्मीद कम, दलाली का खेल ज्यादा
अभिषेक का कहना है कि मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयान होने के बावजूद पुलिस ने गंभीर धाराएं नहीं लगाईं। “आम आदमी की आवाज़ हमेशा दबा दी जाती है,”—यह घटना इस कहावत को फिर से सच साबित करती है। क्या न्याय का अधिकार सिर्फ अमीरों और ताकतवरों के लिए है? मिर्जापुर के किसान को न्याय पाने के लिए पुलिस, प्रशासन और पूरे सिस्टम से लड़ाई लड़नी पड़ रही है, जो कहीं न कहीं सरकार की नाकामी का प्रतीक है।
मिर्जापुर की इस घटना ने साफ दिखा दिया है कि पुलिस की निष्क्रियता सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि एक गहरे षड्यंत्र का हिस्सा है। एक किसान जिसने अपनी फसल बचाने की कोशिश की में जान खतरे में दाल दिया, आज न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है। जहां सवाल यह उठ रहा है की क्या यूपी में न्याय सिर्फ ‘भाषणों’ में मिलेगा, या आम आदमी के लिए भी कभी इंसाफ की कोई उम्मीद होगी? क्योंकि “जब जनता उठती है, तो तख्त और ताज हिल जाते हैं।”